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संवाद  फ़िल्म Film by SAMVAD

अक्षर की बरसात में भरे ज्ञान भंडार

 'संवाद', रांची ने एक फिल्म बनाई है -'अक्षर की बरसात में भरे ज्ञान भंडार।' करीब 9 मिनट की यह फिल्म है।फ़िल्म का निर्माण संवाद द्वारा CRY, Kolkata के सहयोग से हुआ है।यह एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म है

बच्चों के लिए 'संवाद' द्वारा तैयार की गयी इस फिल्म की मूल प्रेरणा व आधार है -'अधूरी शिक्षा का पूरा सच : सवाल, समस्या, लक्ष्य और चुनौती' नामक पुस्तक। वह पुस्तक उन बड़ों के लिए है जो साक्षरता एवं शिक्षा के छोटे-बड़े दीपक और मशालों के जरिये समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाना चाहते हैं। वह पुस्तक भी 'देशज प्रकाशन'   की प्रस्तुति है।

 परिकल्पना-शेखर    कथा-हेमन्त       निर्देशन-शिशिर टुडू    अवधि- 9 मिनट

http://www.youtube.com/user/sarjomsamvad#p/a/u/0/ngXgvLoYYQo

 

शिक्षा,समाज और सत्ता

फ़िल्म  शिक्षा,समाज और सत्ता का निर्माण संवाद द्वारा CRY, Kolkata के सहयोग से हुआ है।यह एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म है यह फिल्म सब‍ को शिक्षा समान शिक्षा के‍‍ सिद्धांत की वकालत करता है।

निर्देशन--शेखर,शिशिर टुडू कथा-शिशिर टुडू

अवधि-35 मिनट

http://www.youtube.com/watch?v=Smv_GedvVVM&feature=related  Part-1

 

http://www.youtube.com/watch?v=pRwxPSfggnw  Part-2

 

जाबॅ चाहिये हमें मारा ख्वाब चाहिये

चाहिये हमें हमारा ख्वाब चाहिये का निर्माण  संवाद द्वारा जुड़ाव और CWS के सहयोग से हुआ है।यह एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म है। इस फिल्म में यह  दर्शाया गया है कि मनरेगा के माध्यम से हम अपने गांव, समाज को कैसे आत्मनिर्भर बना सकते हैं। तथा रोजगार के लिए गांव से होने वाले पलायन को रोक कर किसानों को मजदूर बनने से कैसे रोका जा सकता है।

परिकल्पना-शेखर    कथा-हेमन्त   निर्देशन-शिशिर टुडू     अवधि-25 मिनट

 

हम हैं महिला किसान

फ़िल्म  हम हैं महिला किसान का निर्माण संवाद द्वारा आरोह ,लखन के सहयोग से हुआ है।यह एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म हैखेती में महिलाओं का योगदान सबसे ज्यादा है फिर भी इनको किसान का हक नहीं मिलता है। महिला किसान की हकदारी की वकालत करती है यह  फ़िल्म

 निर्देशन- शेखर   कथा - हेमन्त    अवधि - 35 मिनट

 

बैगा : विकास की राह पर

फ़िल्म  बैगा : विकास की राह पर का निर्माण संवाद द्वारा Oxfam ( India) Trust, Lucknow  के सहयोग से हुआ है। मध्य प्रदेश के डिन्डौरी जिला के बैगा जनजाति के आ‍जीविका एवं आत्मनिर्भरता पर केन्द्रित यह एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म है

निर्देशन--शेखर,शिशिर टुडू  कथा-शिशिर टुडू   अवधि-35 मिनट

 

http://www.youtube.com/user/sarjomsamvad#p/a/u/2/CNpoA9JSTv0  Part-1

 

                                            http://www.youtube.com/user/sarjomsamvad#p/a/u/3/qDUVtrUDIhU Part-2

 

एक प्रयास

फ़िल्म एक प्रयास का निर्माण संवाद द्वारा जुड़ाव  के सहयोग से हुआ है।यह एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म है देवघर जिला के अन्तर्गत मधुपुर प्रखन्ड के लालपुर गाँव में लिफ़्ट एरिगेशन के प्रयोग  को दर्शाती यह फ़िल्म बताती है कि कैसे लालपुर गाँव के लोग पानी अपने गाँव में लाकर तथा जविक खेती के माध्यम से अपनी जिन्दगी बदलते हैं।

निर्देशन-शेखर, सुनील मिंज    कथा-सुनील मिंज     अवधि-15 मिनट

 

http://www.youtube.com/user/sarjomsamvad#p/a/u/1/eorzuJXcfB8

 

 

निशाने पर अकाल

 

प्रकृति की कई परिघटनाएं ऐसी हैं, जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं। लेकिन यह अब साफ नजर आने लगा है कि मनुष्य (खासकर शासक वर्ग) प्रकृति पर नियंत्रण के नाम पर इन परिघटनाओं के विस्फोटक बना रहा है- इनकी मारक क्षमता में वृध्दि कर रहा है। यह तो अब आम जन को भी समझ में आने लगा है कि सुखाड़ या अकाल प्राकृतिक परिघटना नहीं है। सूखा भी सिर्फ प्राकृतिक परिघटना नहीं है।

लंबी अवधि तक पानी की भीषण कमी और सुखाड़ का परिणाम होता है- अकाल! इसे भी प्राकृतिक परिघटना कह दिया जाता है जबकि अकाल एक आर्थिक परिघटना है। गरीब जनता 'प्यासमरी' के साथ-साथ 'भुखमरी' का शिकार होती है। किसान और ग्रामीण खेतिहर मजदूर रोजगार की तालश में शहरों की ओर पलायन करते हैं। इस अकाल से बेअसर समाज का संपन्न वर्ग- सत्ता, संपत्ति और शिक्षा से संपन्न प्रभु वर्ग- इसे भी प्राकृतिक परिघटना करार देता है।

अगर पानी की कमी ही सूखा-सुखाड़ की स्थिति और भुखमरी-पलायन का मुख्य कारण है तो बिहार के बाढ़ प्रवण इलाकों में भुखमरी और पलायन का रिकार्ड बुलंद क्यों है? झारखंड में लोग पानी के बिना मरते हैं और बिहार में लोग पानी से मरते हैं! ऐसा क्यों? क्या इसे प्राकृतिक परिघटना मानकर संतोष किया जा सकता है?

यह फिल्म झारखंड की पृष्ठभूमि में सूखा-सुखाड़-अकाल को समझने का सामूहिक अभ्यास है।

कथा : हेमंत, गीत : शिशिर टुडू,    संगीत : समित दास   संपादन : अरुण प्रकाश    निर्देशन : शेखर    अवधि : 27 मिनट

 

 

दत्ता भाऊ यायावर सहयात्री

दत्ता भाऊ... दत्तात्रे शंकर सावले दत्ता जी शिक्षक हैं। जीवन के हर क्षेत्र में विद्यार्थियों के सहयात्री।

वह मार्गदर्शक हैं। सब के साथ बनी-बनायी राह पर चलते हैं लेकिन चलकर राह बनाने की दृष्टि देते हैं।

दत्ता भाउ की आयु आज 75 वर्ष पार कर चुकी। उम्र की गहरी रेखाएं चेहरे पर दिखती हैं पर हृदय की गहराइयों में समाया यायावर, घुमक्कड़ शिक्षक आज भी देश के किसी भी इलाके के दलितों, आदिवासियों और वंचितों में उनकी अपनी शक्ति में भरोसा पैदा करने के लिए उनकी पीड़ा-अभाव को बांटने के लिए घर से घर से निकल पड़ने को तत्पर है...यात्रारत है।

पटकथा : हेमंत, शिशिर टुडू   संपादन एवं निर्देशन : शेखर    अवधि: 37 मिनट

 

 

हक की ओर बढ़ते कदम

भारत में आज लगभग 20 प्रतिशत आबादी पेयजल के स्थायी अभाव में जी रही है। करीब 20 प्रतिशत आबादी प्रदूषित पानी पर ही जिंदा है! 50 प्रतिशत से भी अधिक गांव-शहर पेय-जल की कमी और अनियमित आपूर्ति की समस्या झेल रहे हैं। ताजा आंकड़ें बोलते हैं कि भारत में 20 करोड़ लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध् नहीं है। यह समस्या मात्रा भारत की नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व की है। संयुक्त राष्ट्र की एक घोषणा के अनुसार, .... अगर यही हाल रहा तो 2025 तक दुनिया में हर 3 में से 2 लोग पानी की कमी से त्रस्त हो जाएंगे।

FANSA  के नाम से लोकप्रिय, फ़्रेशवाटर एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया ने दक्षिण एशिया में डीएफआइडी के अंतर्गत गवर्नेन्स ट्रान्सपेरेन्सी फंड (GTF) के तहत, पानी और स्वच्छता के संदर्भ में महत्वपूर्ण पहल की है।

FANSA की इस पहल में आंध्रप्रदेश के 'MARI' (वारंगल) तथा 'CRSD' (अनंतपुर), 'ग्राम विकास', बरहमपुर(उड़ीसा) और 'साथी',गोड्डा (झारखंड) सहयोगी हैं।

कथा-शिशिर टुडू  निर्देशन--सुनील मिंज  निर्देशन--शेखर   अवधि- 30  मिनट

 

काठीकुंड का सच

फ़िल्म  काठीकुंड का सच  का निर्माण संवाद द्वारा  हुआ है। यह एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म है  यह फिल्म 6 दिसम्बर 2008 को काठीकुंड, दुमका, झारखंड में अपने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए शांतिमय प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों के जुलूस पर पलिस के बर्बर आक्रमण के दास्तान बताती है।

अवधि - 20 मिनट

 


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