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संवाद की रजत जयंती के अवसर पर प्रकाशित यह विजन डॉक्यूमेंट संस्था की 25 वर्षों की वैचारिक, सामाजिक और रचनात्मक यात्रा का दस्तावेज़ होने के साथ-साथ वर्ष 2026 से 2050 तक की भावी दिशा का भी स्पष्ट खाका प्रस्तुत करता है। इसमें स्वशासन, स्वावलंबन, स्वाभिमान, आजीविका, आज़ादी और आनंद पर आधारित 'इंडिजीनोक्रेसी' की अवधारणा को केंद्र में रखते हुए आदिवासी जीवन-दृष्टि, जल–जंगल–ज़मीन के संरक्षण, जलवायु न्याय, महिला नेतृत्व, ग्राम स्वशासन और सामाजिक समानता पर आधारित समाज निर्माण की रणनीति प्रस्तुत की गई है। यह दस्तावेज़ अगले 25 वर्षों के लिए संवाद की वैचारिक प्रतिबद्धताओं, प्राथमिकताओं और परिवर्तनकारी पहलों का दूरदर्शी घोषणापत्र है।

संवाद रजत जयंती के अवसर पर प्रकाशित | "संवाद की महिला सहयात्री" पुस्तक मात्र संस्मरणों का संकलन नहीं है, बल्कि यह पुस्तक संवाद से जुड़ी वैसे महिला कार्यकर्ताओं के जीवन का दस्तावेज है, जिन्होंने अपने निजी संघर्षों के रास्ते समाज के परिवर्तन की राह बनाई है। यह किताब हमें बताती है कि परिवर्तन किसी बड़े मंच, बड़े नाम या बड़े संस्थानों से ही नहीं आता — कभी-कभी वह एक गाँव की महिला की चुपचाप बढ़ती हिम्मत से भी जन्म लेता है।

इस किताब के प्रथम अध्याय में बिहार और झारखंड की प्राथमिक शिक्षा, सर्वशिक्षा और साक्षरता के संदर्भ में दृश्य प्रस्तुत किए गए हैं। दूसरे अध्याय में झारखंड के अनुसूचित जनजातीय आवासीय विद्यालयों का मूल्यांकन है। तीसरा अध्याय में बालिका शिक्षा के सार्वजनीकरण की दशा-दिशा से संबंधित है। चौथे अध्याय में कुकुरमुत्तों जैसे फैलते निजी स्कूलों की तस्वीर है। पांचवे अध्याय में बिहार के प्राथमिक शिक्षा के सच का उल्लेख है तो आखिरी अध्याय में झारखंड में प्रचलित सहभागी प्राथमिक शिक्षा प्रबंधन में ग्राम शिक्षा समितियों की भूमि का आकलन है।

यह पुस्तक एक रिपोर्ट है, जो क्रेज, झारखंड के सर्वेक्षण व विश्लेषण पर आधरित है। इस रिपोर्ट में झारखंड में जो स्कूली शिक्षा प्रणाली है, उसकी मौजूदा स्थिति की संतुलित समीक्षा की गई है। इसमें यह विचार विमर्श है कि आखिर मौजूदा निराशाजनक परिस्थति क्यों बन रही और यह बताने की कोशिश भी है कि इसमें सुधार लाने के लिये क्या किया जा सकता है।

'बचपन के दिन' रेणुका वर्मा का ऐसा कविता-संग्रह है, जो बचपन की स्मृतियों का सजीव पुनर्सृजन करता है। कवयित्री बाल-मन में उतरकर सहज, संप्रेषणीय और लयात्मक भाषा में उन रंगों, बिम्बों और अनुभवों को जीवंत करती हैं, जो समय के साथ पीछे छूट गए हैं। इन कविताओं में वयस्क दृष्टि का बोझ नहीं, बल्कि बच्चे की निष्कलुष संवेदना, जिज्ञासा और कल्पनाशीलता का स्वाभाविक विस्तार है। धरती से आकाश तक फैले इस संसार में प्रकृति, पशु-पक्षी, इन्द्रधनुष और संगीत जीवन के सहज साथी बनकर उपस्थित हैं। यह संग्रह बच्चों को प्रकृति के निकट ले जाते हुए उन्हें आनंद, संवेदना और कल्पना से भरपूर एक सतरंगी दुनिया का अनुभव कराता है।

यह पुस्तक शिक्षा को मुक्ति और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में देखने का आग्रह करती है। अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का रचनात्मक आधुनिकीकरण करते हुए शिक्षा ने समाज को साम्राज्यवाद के विरुद्ध सजग और सशक्त बनाया है। भारत के लिए भी यह आवश्यक है कि शिक्षा को एक परिवर्तनकारी परियोजना के रूप में विकसित किया जाए, जो विभिन्न समाजों, संस्कृतियों और क्षेत्रों की विशिष्टताओं को समाहित करे। इन्हीं दृष्टियों को केंद्र में रखकर संवाद ने 'शिक्षा : मुक्ति विमर्श' प्रकाशित की है, ताकि शिक्षा, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और वैकल्पिक विकास की दिशा में सार्थक एवं व्यापक विमर्श को आगे बढ़ाया जा सके।

प्राचीन काल से ही झारखण्ड अपना स्व-शासन एवं स्व-राज रहा है। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में उनकी इस वयवस्था को तोड़ने का प्रयास किया गया। इसके जवाब में आदिवासियों के सशस्त्र संघर्ष की श्रृंखला का इतिहास पढ़ने-सुनने को मिलता है।

'बाल संरक्षण और बाल अधिकार' पुस्तिका वैश्विक स्तर पर विकसित बाल-अधिकारों के सिद्धांतों और मानकों से समाज को परिचित कराते हुए उनके प्रति व्यापक जागरूकता का प्रयास करती है। झारखंड में स्वशासन, स्वायत्तता और सांस्कृतिक अस्मिता का सदियों पुराना संघर्ष समानता, सामुदायिकता, स्त्री-पुरुष समता और देशज लोकतांत्रिक परंपराओं पर आधारित रहा है। यही स्वशासी दृष्टि बाल-अधिकारों की सुरक्षा, सम्मान और सहभागिता को लोकतंत्र का अनिवार्य आधार मानती है। यह पुस्तक बाल-अधिकारों के प्रश्न को झारखंड की देशज लोकतांत्रिक परंपराओं से जोड़ते हुए संवेदनशील, न्यायपूर्ण और अधिकार-आधारित समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल प्रस्तुत करती है।

पारंपिक तौर पर भारत में खेतीबारी को आजीविका का सर्वोत्तम साधन मन गया है। 'उत्तम खेती, मध्यम बान /अधम चाकरी, भीख निदान 'हमारे बुजुर्ग यही सूक्ति बार-बार दोहराया करते थे। परन्तु उस वक़्त मौसम का मिजाज बदला नहीं था। समय पर नियमित वर्षा होती थी और उसी अनुरूप खेतीबारी भी होती थी।

जैविक खेती कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के अप्रयोग या न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है।[सन् 1990 के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफ़ी बढ़ा है।]

'चंपारण का गांधी : गांधी का चंपारण – सर्वेक्षण के आईने में' चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष (2017) के संदर्भ में गांधी और चंपारण के ऐतिहासिक संबंधों का नए दृष्टिकोण से अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक सत्याग्रह को केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि स्वराज, नैतिक प्रतिरोध और जनभागीदारी की परिवर्तनकारी प्रक्रिया के रूप में देखती है। गांधी के पत्रों, दस्तावेजों और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर यह चंपारण सत्याग्रह के अनदेखे पहलुओं को सामने लाती है। शोधपरक दृष्टि से समृद्ध यह कृति गांधी के विचार, सत्याग्रह की अवधारणा और भारतीय लोकतंत्र की वैचारिक नींव को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।

डॉ. रोज केरकेट्‌टा के कथा संग्रह 'पगहा जोरी-जोरी रे घाटो' झारखंडी जनमानस सहित नारी संवेदना कि अनूठी अभिव्यक्ति का ताजातरीन दस्तावेज है। हर्ष है कि झारखंड के दो विश्वविद्यालयों, रांची विश्वविद्यालय एवं विनोबा भावे विश्वविद्यालय ने इस कथा संग्रह को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने कि अनुशंसा कि है। प्रस्तुत पुस्तिका कथा संग्रह कि कथाओं पर देश व राज्य के जानेमने साहित्यकारों व समीक्षकों के विचारों का संकलन है जो उन्होंने कथा संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर रांची में व्यक्त किए थे।

उन लाखो-करोड़ो लोगो को जो आज भी अपने स्वशासन स्वालम्बन और स्वाभिमान की रक्षा की लिए आजीविका, आजादी आनंद के औज़ार से नै दुनिया गढ़ने को सरजोम की तरह अड़े और खड़े है - संघर्ष के मैदान में।

जलवायु संकट आज की दुनिया के बड़े संकटों में से एक है। इसके समाधान के लिए पूरी दुनिया की सरकारें, यू.एन. जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं तथा अन्य स्वैच्छिक संस्थाएं न सिर्फ चिंतित हैं बल्कि चिंतनरत भी हैं। चिंतन का यह दौर पिछले ढाई दशक से जारी है बावजूद इसके संकट घटने के मुकाबले बढ़ता ही जा रहा है। क्यों हो रहा है ऐसा? क्या चिंतन की दशा और दिशा में तो कहीं दोष नहीं है? उक्त प्रश्नों पर विचार करने से पूर्व यह विचार करना जरूरी लगता है कि जलवायु संकट के लिए जिम्मेवार कारकों को क्या हमने पहचानने की कोशिश की है? क्या महज विकसित देशों के नजरिये और कथित वैज्ञानिक ढंग से देखने को पहचानना माना जाएगा या फिर इसे और गंभीरता से समझने की जरूरत है?

The climate crisis is one of the world's biggest issues. Governments of the whole world, international organizations like United Nations and other voluntary organizations are not only worried about but also thinking for its solution. This period of contemplation has been going on for the last two decades, yet this crisis is increasing instead of decreasing. Why is such happening? Is there any fault in the conditions and direction of contemplation? Before considering the questions, it seems necessarily to be considered that, but such was not done to identify the factors responsible for the climate crisis? We have the point of view of developed countries and the so-called scientific way of seeing be considered identity or does it need to be understood more seriously.